कैसे कहूं मैं तुम से, अपने इस दिल की बात,
हिम्म्म्मत तो की इतनी, लबों ने पर न दिया साथ.
अपनी यह चाहत ले कर, करूं मैं अब तुझसे क्या इजहार,
दिन तो कट जाते हैं कट ती नही यह रात.
किया पता तुम्हे इस दिल की हालत,
जिस की सागर सी गहराई तक सिर्फ़ तुम हो.
किया जानो मेरी दीवानगी और जूनून,
के तुम इतनी दूर होते हुए भी,
दिल के बोहोत करीब हो.
कुछ गुस्सा, कुछ नखरा, कुछ इल्तिजा भी है आप की,
हम से रूठना, हमें सताना,
तरपाने की अदा भी है आप की.
हर बात पे हँसना, हर पल मुस्कुराना,
हर बातों से दिल धर्काना.
अपनी शर्मीली नज़रों से, सुर्ख होंठों से,
हर साँसों को चू लेना.
क्या क्या करे यह दिल अफ़साने बयान आप के,
आप मसीहा-ऐ-इश्क हैं,
यह बन्दा खादिम है सिर्फ़ आप का.
Friday, 22 February 2008
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